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वो बचपन का इतवार

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माँ के आँचल में छुपी वो जन्नत की छाँव,
पिता के कन्धों पर घूमा वो सारा गाँव।
कागज़ की नाव में वो समंदर का सफर,
न कल की चिंता, न किसी बात का डर।

अब तो बस फाइलों में दब गई हैं वो ख्वाहिशें,
लौट कर नहीं आतीं वो सावन की बारिशें।
पैसे तो बहुत कमा लिए इस भागदौड़ में,
पर सुकून वाला वो बचपन का इतवार अब नहीं मिलता।
ज़िंदगी तो अब भी चल रही है अपनी रफ़्तार से,
पर खुल कर हंसने का वो अधिकार अब नहीं मिलता.
लेखक: Anand
यह रचना वेबसाइट यूज़र द्वारा भेजी गई है।