माँ - मेरे हर जख्म का मरहम
"मां" को नमन करते हुए मेरी कुछ पंक्तियां:
*मां- मेरे हर जख्म का मरहम*
जड़ से चेतन बनने का सफर,
शून्य से अस्तित्व की डगर,
तू है तो ये सारा जहान है मां,
तुझ बिन रुक जाए, सृष्टि का ये चक्र।।
तेरे बलिदानों का ना कोई हिसाब,
ना ही तेरी ममता का कोई बखान,
तेरी गोद में पाई मैंने जो राहत,
उसका कुछ शब्दों में कैसे करूं बखान?।।
कोई कहे सृष्टि का आधार है तू,
कोई कहे नवचेतना का संसार है तू,
कितने ही शब्दों में बांधना चाहे कवि कोई,
पर मां.. अनंत शब्दों का संसार है तू।।
तू वो नहीं जो कुछ कविताओं में समा जाए,
तू वो नहीं जो कुछ शब्दों में ढल जाए,
जख्म चाहे हो मेरा कितना भी गहरा,
हर जख्म का मां तू मरहम बन जाए।।
डा. निधि माहेश्वरी,शिक्षिका
बेसिक शिक्षा विभाग, हापुड़
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